Sarita
अगस्त (द्वितीय )की संपादकीय टिप्पणी " पाला बदलवाने की नीति" और " धर्म परिवर्तन" पढ़कर मुझे तो ऐसा लगा मानो, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिसमें नुकसान सिर्फ आम जनता को ही है। राजनीतिज्ञ पार्टी बदलकर जनता के दिए गए वोट का अपमान कर रहे हैं तो, पंडित, मौलवी, पादरी इत्यादि धर्म परिवर्तन करवा कर आम जनता को धर्म की बेड़ियों से बांध रहे हैं। जहां धर्म जनता को कमजोर कर रहा है वहीं राजनीति उन्हें पटखनी दे दे रही है। वैसे तो कोई भी दल अपने विपक्षी दल की बुराई करते नहीं थकता परंतु, जब उस दल का कोई नेता पाला बदलना चाहता है तो उसका विभीषण की तरह स्वागत किया जाता है। सभी जानते हैं कि इसमें सिर्फ और सिर्फ राजनेताओं का ही स्वार्थ निहित है। देश हित की तो केवल दुहाई दी जाती है। धर्म के ठेकेदार भी अपने धर्म को अन्य धर्मों की अपेक्षा सर्वोत्तम ही बताते हैं परंतु मात्र कुछ धार्मिक अनुष्ठानों के द्वारा वह व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करके उसे अपने पाले में कर लेते हैं। क्या इससे उक्त व्यक्ति की मानसिकता भी परिवर्तित हो जाती है? इसका तात्पर्य तो यही निकलता है कि यहां इंसान की कोई पहचान नहीं है... सिर्फ धर्म ही उन्हें उनकी पहचान दे सकता है। ठीक उसी प्रकार एक नेता की अपनी कोई पहचान नहीं। उसके कार्य उसके लिए कोई मायने नहीं रखते, उसके नाम के साथ जिस दल का नाम जुड़ा है वही मायने रखता है बस....। सदियों से सत्ता और धर्म ही युद्ध का कारण बनती आई हैं हमने इतनी तरक्की कर ली है परंतु ना तो हमारे समाज मे शांति स्थापित हो पाई है, ना ही हमारे मन को शांति मिली है। हम किस दल को वोट दे कि हमारा देश और समाज सुरक्षित हो....? तथा हम किस धर्म में जाए कि हमारा जीवन और भविष्य सुरक्षित हो....? यह आजकल का यक्ष प्रश्न है।
आरती प्रियदर्शिनी , गोरखपुर
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