घर आजा परदेसी
घर आजा परदेशी "नव्या डियर... छुट्टियों की प्लानिंग कर लो, तो टिकट बुक करवा लूं। कहां चलना है... मायके या ससुराल...? भई, मैं तो कहीं भी जाने को तैयार हूं। तुम ही फैसला करके बता दो जल्दी।"---- शिवम ने लैपटॉप में आंखें गड़ाए हुए कहा। " इस बार मैं कहीं नहीं जाने वाली। बस आराम करूंगी ताकि शत-प्रतिशत तरोताजा होकर ऑफिस में काम कर सकूं। वैसे भी दिसंबर-जनवरी में ऑफिस का काम कुछ ज्यादा ही रहता है। पिछली बार का याद है ना..... आते वक्त फ्लाइट इतनी लेट हो गई थी कि हम रात के 2:00 बजे यहां पहुंचे । और सुबह से ऑफिस जाना था हम लोगों को । मैं तो आज भी वो दिन को याद करके सिहर उठती हूं। मुझे नहीं जाना कहीं भी..."---- मैंने आँखें बड़ी करते हुए ने दोनों हाथ ऊपर उठा दिया। शिवम को पता था कि मैंने एक बार इनकार कर दिया तो कर दिया। मेरी हां ना में बदल सकती थी। परंतु ना हां मैं कभी नहीं बदल सकती। "... लेकिन माँ बहुत जोर दे रही है जानू , कह रही है कि दीपावली में नहीं तो कम से कम छठ में तो जरूर आ जाओ। पिछले साल जब आर्यन की बीमारी की वजह से हम नहीं जा पाए थे तो मां ने मनौती मांगी थी क...