आजादी के मायने
आजादी के मायने
सबसे पहले तो मैं अपने सभी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई देना चाहुंगी। वर्ष 1947 से 2020 तक का 74 वर्षों का यह सफर हमारे देश की प्रगति का सफ़र रहा है। आर्थिक सामाजिक राजनीतिक एवं व्यवसायिक स्तर पर हमारे देश ने वैश्विक प्रगति की है। आज हमारे देश का हर नागरिक अपने सभी अधिकारों का प्रयोग करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है। आज विश्व पटल पर भारत का नाम एक सशक्त देश के रूप में लिया जा रहा है। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के समय में भी देश की जनता ने धैर्य एवं सद्भावना की मिसाल पेश की है। और पूरा विश्वास है कि हम जल्द हीं इस आपदा से छुटकारा पा लेंगे।
इन सब उपलब्धियों के बावजूद जब हम आजादी का विश्लेषण करने के लिए बैठते हैं तो ऐसा लगता है मानो अभी कहीं कुछ अधूरा सा है आजादी का मतलब क्या सिर्फ सत्ता परिवर्तन होना ही था ? क्या अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना ही आजादी है ? क्या हमे सिर्फ ब्रिटिश सरकार से ही स्वतंत्रता चाहिए थी ?
यह सब तात्कालिक कारण हो सकते थे ,परंतु आज आजादी के संदर्भ में मुझे ऐसा लगता है कि आज हमें दो सबसे महत्वपूर्ण चीजों से आजादी पाने की सख्त आवश्यकता है।
सर्वप्रथम प्रदूषण से आजादी :---
" अरुण यह मधुमय देश हमारा
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।
सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।।"
उपरोक्त कथन प्रख्यात कवि जयशंकर प्रसाद का है जिसमें उन्होंने देश की खूबसूरती का बड़ा ही खूबसूरत वर्णन किया है। परंतु आज यह नैसर्गिक सुंदरता नष्ट हो रही है हम अंग्रेजों की गुलामी से तुम मुक्त हो चुके हैं परंतु अपने देश के प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा नहीं कर पा रहे हैं। हमारा देश निरंतर प्रदूषण की मार झेल रहा है। खेती योग्य भूमि कम होती जा रही है हरे भरे जंगलों के स्थान पर कंक्रीट के जंगल घूम रहे हैं जल थल वायु कुछ भी प्रदूषण की मार से अछूता नहीं है जिस धरती और गंगा मां की पवित्रता की हम शपथ लेते थे वह आज प्रदूषित हो चुकी है। कोविड-19 ने हमे यह एहसास दिला दिया है कि मानव का अस्तित्व प्रकृति से है,और प्रकृति से हमे उतना हीं लेने का अधिकार है जितना हम उसका संरक्षण कर सके। नैसर्गिक संपदाओं पर जितना अधिकार मानव का है उतना हीं अधिकार अन्य पशु पक्षियों एवं चराचर प्राणियों को भी है अतः हमे प्रकृति का दोहन करने से बचना होगा।
दूसरी आजादी हमें अपने अमानवीय व्यवहार से पाने की आवश्यकता है।
"मानवता की दुर्गति देखें,
कोई सुन ले यह आर्त्तनाद,
कोई कह दे, क्यों आन पड़ा
हम पर ही यह सारा विषाद?
उपचार कौन? रे! क्या निदान?"
रामधारी सिंह दिनकर की यह पंक्तियां आज भी प्रासंगिक है। आज हर व्यक्ति संवेदनहीनता एवं अमानवीयता की पराकाष्ठा पार कर चुका है ।धर्म, जाति ,प्रजाति के नाम पर हम सब आपस में लड़ रहे हैं। मंदिर मस्जिद के लिए एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं। तकनीक का भी हम सदुपयोग कम और दुरुपयोग ज्यादा कर रहे हैं। असहिष्णुता और नैतिक पतन आज चरम सीमा पर है। हर व्यक्ति किसी अनजाने से भय के साए में जी रहा है.. स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहा है। इसलिए आज जरूरत है कि हम विदेशी शत्रुओं के साथ-साथ अपने अंदर के शत्रुओं का भी विनाश करने की कोशिश करें। 1947 से पहले आजादी के दीवानों के दिलो-दिमाग में "भारत की आजादी" के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता था ।वह स्वयं शहीद हो गए मगर उन्होंने हमें सोचने और समझने की भी आजादी दी है। आज देश की सुरक्षा देश के जवान सीमा पर कर रहे हैं। ऐसे में क्या भारतीय नागरिक होने के नाते हमारा यह फर्ज नहीं बनता कि हम अपने देश को प्रदूषण एवं अमानवीय व्यवहार की गुलामी से आजादी दिलवाएँ ताकि हमारा भारत देश "सोने की चिड़िया" नहीं तो कम से कम "मनुष्यों का देश" बन जाए।
आरती प्रियदर्शिनी ,गोरखपुर
Comments
Post a Comment