क्यों छली जाती हो तुम
क्यों छली जाती हो तुम
क्यों छली जाती हो तुम
कभी सीता बनकर राम से
तो कभी राधा बनकर श्याम से
क्यों तुम्हारे होंठ सिल जाते हैं
कभी अग्नि परीक्षा के समय
तो कभी चीरहरण के समय
तुम अहिल्या नहीं जिसे राम की चरण धूलि चाहिए
तो वह गंगा भी नहीं जिसे भगीरथ ने पीछे चलने पर विवश किया
तुम तो काली हो दुर्गा हो जिसने रणचंडी बन कर दैत्यों का लहू पिया
फिर क्यों नहीं उठती हो आज
मिटा क्यों नहीं देती हर उस रेखा को
जिसके बाद कोई रावण खड़ा है
सृजन करो अब आकाश नया
सिर्फ धूप ही नहीं सूर्य भी नया
करो आगाज नए संस्करण का
और तय करो अब जीवन नया
आरती प्रियदर्शिनी गोरखपुर
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