Grihshobha ke december second me prakashit
गृहशोभा का नवंबर (द्वितीय )अंक में विहंगम के अंतर्गत प्रकाशित टिप्पणी "धर्म हटाओ औरत बचाव" में बिल्कुल सही बात कही है आपने। सदियों से धर्म का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएं ही होती रही हैं। शायद इसलिए आज भी धार्मिक क्रियाकलापों एवं आयोजनों में महिलाओं की उपस्थिति सबसे अधिक है। घरों में भी पुरुषों से ज्यादा महिलाएं ही धर्म कर्म में संलिप्त होते हैं। आधुनिकाओं की बात करें तो वह भी करवा चौथ, नवरात्रि इत्यादि व्रत रखना "फैशन ट्रेंड में है" कहकर करती हैं। अत्यधिक महिलाओं की यही धार्मिक अंधविश्वास कुछ नास्तिक महिलाओं का आत्मविश्वास तोड़ देता है। ऐसा लगता है कि महिलाएं स्वयं ही धर्म के इस बंधन में सुरक्षित महसूस करती हैं। ज्यादातर महिलाएं ही हैं जो पूजा पाठ करने वाली स्त्री को "संस्कारी" और ना करने वाले को "पापिन" की उपाधि देती हैं। और अपनी नई पीढ़ियों को भी यही संदेश देती हैं। अब जब तक महिलाएं स्वयं इस तथाकथित "कंफर्ट जोन' से बाहर नहीं आना चाहती, तब तक उनकी सुरक्षा खतरे में ही रहेगी।
आरती प्रियदर्शिनी , गोरखपुर
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