कविता

                   अजनबी जिंदगी

जाने क्यूं ये जिंदगी अजनबी सी लगती है
कभी अपनी तो कभी बेगानी सी लगती है
हर बार पाई हैं हमने अपनी मंजिलें
कभी गिरकर ...तो कभी उठ कर संभलते हुए
खुद का सहारा लेकर ....तो कभी अपनी उंगली थामे हुए
और एकाकीपन मुझे सच्ची सहेली सी लगती है
कल जो सूरत जानी पहचानी से लगती थी
आज क्यूँ धूल-धूसरित और गाली-सी लगती है

हर चेहरे के पीछे एक चेहरा है
हर दिल का कोई राज गहरा है
हर किसी ने दिल को एक जख्म दिया है
किसी ने हल्का ....किसी ने गहरा कर दिया है
बरसों बिते....पर तूने कल हरा कर दिया
अब क्यूँ हर जख्म मुझे धीमी चिंगारी सी लगती हैं

                              ✍ आरती प्रियदर्शिनी, गोरखपुर

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