घरेलू हिंसा कानून : सास बहु दोनो के लिए

सास- बहू का रिश्ता : नए नजरिये की आवश्यकता
                     मेरे मोहल्ले में एक वृद्ध महिला अपने घर में अकेली रहती है। वह बेहद मिलनसार एवं हंसमुख है।उनका एकलौता बेटा और बहू भी इसी शहर में अलग घर लेकर रहते हैं। एक दिन जब मैंने उनसे इस बारे में जानना चाहा तो उन्होंने जो कुछ भी बताया वह सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
उन्होंने बताया ---- " मेरे बेटे ने प्रेम विवाह किया था।फिर भी हमने कोई ऑब्जेक्शन नहीं किया ।बहू ने भी आते हीं अपने व्यवहार से हम दोनों का दिल जीत लिया। 2 साल बहुत अच्छे से बीते। लेकिन मेरे पति के स्वर्गवासी होते ही मेरे प्रति अप्रत्याशित रूप से  बहू का व्यवहार बदलने लगा। अब वह बेटे के सामने तो मेरे साथ अच्छा व्यवहार करती, परंतु उसके जाते हैं वह बात बात पर मुझे ताने देती और हर वक्त झल्लाती रहती। मुझे लगता है कि शायद अधिक काम करने की वजह से वह चिड़चिड़ी हो गई है इसलिए मैंने उसके काम में भी हाथ बँटाना शुरू कर दिया। मगर उसने तो जैसे मेरे हर काम में मीन मेख निकालने की ठान रखी थी।
                           धीरे-धीरे वह घर के सभी चीजों को  अपने तरीके से रखने एवं इस्तेमाल करने लगी।  हद तो तब हो गई जब उसने फ्रिज और रसोई को भी लॉक करना शुरू कर दिया।  एक दिन वह मुझसे मेरे अलमारी की चाबी मांगने लगी। मैंने इनकार किया तो वह झल्लाते हुए मुझे अपशब्द कहने लगी। जब मैंने यह सब कुछ अपने बेटे को बताया तो वह भी बहू की हीं जबान बोलने लगा,फिर तो मुझे अपनी बहू का एक नया ही रूप देखने को मिला। वह जोर जोर से रोने चिल्लाने लगी ,तथा रसोई में जाकर आत्महत्या का प्रयास भी करने लगी। साथ ही यह भी धमकी दे रही थी कि वह यह सब कुछ वीडियो बनाकर पुलिस में दे देगी, और हम सब को  दहेज लेने तथा बहू को प्रताड़ित करने के इल्जाम में जेल की  चक्की पिसवाएगी। उस समय तो मैं चुप रह गई ,परंतु मैंने हार नहीं मानी। अगले ही दिन बिना बहू को बताए उसके माता पिता को बुलवाया। अपने एक वकील मित्र तथा कुछ रिश्तेदारों को भी बुलवाया। फिर मैंने सब के सामने अपने कुछ जेवर तथा पति की भविष्य निधि के कुछ रुपए अपने बेटे बहू को देते हुए इस घर से चले जाने को कहा। मेरे वकील मित्र ने भी बहू को निकालते हुए कहा कि महिला संबंधी कानून सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं बल्कि तुम्हारी सास के लिए भी है। तुम्हारी सास भी चाहे तो तुम्हारे खिलाफ रिपोर्ट कर सकती है। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम सीधी तरह से इस घर से चली जाओ। मेरा यह रूप देखकर बहू और बेटा दोनों ही चुपचाप यहां से चले गए अब मैं भले ही अकेली हूं परंतु स्वस्थ एवं सुरक्षित महसूस करती  हूँ।"
        उक्त महिला की यह स्थिति देख कर मुझे ऐसा लगा कि अब इस रिश्ते को एक नए नजरिए से भी देखने की आवश्यकता है।  सास बहू के बीच झगड़े होना आम बात है। परंतु ,जब सास अपनी बहू के क्रियाकलापों से खुद को असुरक्षित एवं मानसिक रुप से दबाव में महसूस करें तो इस रिश्ते से अलग हो जाना ही उचित है।बदलते समय और बिखरते संयुक्त परिवार के साथ  सास बहू के रिश्तों में भी काफी परिवर्तन आया है। एकल परिवार की वृद्धि होने के कारण लड़कियां प्रारंभ से ही सास विहीन ससुराल की ही अपेक्षा करती हैं। वह पति एवं बच्चे तो चाहती हैं परंतु पति से संबंधित अन्य कोई रिश्ता उन्हें गवारा नहीं होता। शायद वह यह भूल जाती है कि आज यदि वह बहू है तो कल वह सास भी बनेगी। तब क्या स्वयं के लिए ऐसा ही बेटा-बहू विहीन घर की कल्पना कर सकेगी ?
कानून क्या कहता है ? -----  केंद्रीय महिला बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने एक अंग्रेजी अखबार "द इंडियन एक्सप्रेस "के जरिए यह कहा था कि घरेलू हिंसा कानून ऐसा होना चाहिए जो बहू के साथ-साथ सास को भी सुरक्षा प्रदान कर सके। क्योंकि अब बहुओं द्वारा सास को सताने के भी बहुत मामले आ रहे हैं।  सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि हिंदू लॉ के मुताबिक कोई भी बहू किसी भी बेटे को उसके मां-बाप के पवित्र दायित्वयों के निर्वहन से मना नहीं कर सकती।

समाज क्या कहता है ? ------  भारतीय समाज के लोगों ने अपने मन में इस रिश्ते को लेकर काफी पूर्वाग्रह पाल रखे हैं। विशेषकर युवा पीढ़ी बहू को हमेशा बेचारी एवं सास को ही दोषी मानती है। युवतियां भी शादी से पहले से ही सास बहू के रिश्ते के प्रति  वितृष्णा से भरी होती है। ससुराल में जाते ही सब कुछ अपने तरीके से करने की जिद में लग जाती है। पति को म्माज बॉयज कहकर ताने देती हैं तो सास को भी अपने बेटे से दूर रखने की कोशिश करती है।

फिल्में और धारावाहिकों का प्रभाव ------  हम माने या ना माने परंतु फिल्में एवं धारावाहिक हमारे भारतीय परिवार एवं समाज पर गहरा असर डालते हैं। पुरानी फिल्मों में बहू को बेचारी तथा सास को दहेज लोभी कुटिल एवं बहू को जलाकर मार डालने वाली दर्शाया जाता था। कई नायिकाएं तो विषेश रुप से कुटिल सास का बेहतरीन अभिनय करने के लिए ही जानी जाती हैं। आजकल के सास बहू सीरीज धारावाहिकों का फलक इतना विशाल रहता है कि उसमें सबकुछ समाया रहता है। कहीं गोपी ,अक्षरा और इशिता जैसी  संस्कारशील बहुएँ हैं तो  कहीं गौरा और दादीसा जैसी कठोर तथा खतरनाक सास भी है। कोकिला जैसी अच्छी सास भी है तो राधा जैसी सनकी बहुएं भी हैं। अब इनमे से कौन सा किरदार किस के ऊपर क्या प्रभाव डालता है यह तो आने वाले समय में ही पता चलता है।
                       आज के व्यस्त समाज में आशा सहाय एवं विजयपत सिंघानिया की स्थिति देखकर तो यही लगता है कि अब हम सब को अपने वृद्धावस्था के लिए जवानी में ही ठोस उपाय कर लेने चाहिए। कई यूरोपियन देशों में तो व्यक्ति अपने मृत्यु उपरांत शोक मनाने के लिए भी सारे इंतजाम करने के बाद ही मरता है। हमारे समाज का तो ढांचा ही कुछ ऐसा है कि हम अपने बच्चों से बहुत सारी अपेक्षाएं रखते हैं। हिंदू धर्म के मान्यता अनुसार बेटे-बहू के हाथ से तर्पण एवं मोक्ष पाने का लालच इतना ज्यादा है कि चाहे जो भी हो जाए वृद्ध दम्पति बेटे बहू के साथ ही रहना चाहते हैं । बेटियां चाहे जितना भी प्यार करें वह बेटियों के साथ नहीं रह सकते, ना ही उससे कोई मदद मांगते हैं।कुछ बेटियां भी शादी के बाद मायके की जिम्मेदारी से  पल्ला झाड़ लेना चाहती हैं, और दामाद को तो ससुराल के मामले में बोलने का कोई हक ही नहीं होता।
                 भारतीय समाज में एक औरत के लिए सास बनना किसी 'पदवी' से कम नहीं होता। उन्हें लगता है कि अब तक उसने बहू बनकर काफी दुःख झेले हैं,और अब तो वह सास बन गई है अतःअब उसके आराम करने के दिन है। सास की हमउम्र सहेलियां भी बहू के आते हीं उसके कान भरने शुरू कर देती हैं। " बहु को थोड़ा कंट्रोल में रखो,अभी से छूट दोगी तो पछताओगी बाद में",  "उसे घर के रीति-रिवाज अच्छे से समझा देना और उसी के मुताबिक चलने को कहना " , " अब तो तुम्हारा बेटा गया तुम्हारे हाथ से" , इत्यादि जुमले अक्सर सुनने को मिलते हैं ।ऐसे मे नयी नयी सास बनी एक औरत असुरक्षा की भावना से घिर जाती है। और बहू को अपना प्रतिद्वंदी समझ बैठती है। जबकि सही मायने में देखा जाए तो सास बहू का रिश्ता मां बेटी के जैसा तो होता ही है, और आप चाहें तो अब गुरु और शिष्या के जैसा भी हो सकता है, तथा दो सहेलियो के जैसा भी।  यदि हम कुछ बातों का विशेष रुप से ध्यान रखें तो ऐसी परिस्थितियों से निपटा जा सकता है। जैसे : ---

*  नई बहू के साथ घर के बाकी सदस्यों के जैसा ही व्यवहार करें। उससे प्यार भी करें और विश्वास भी परंतु ना तो 24 घंटे उस पर निगरानी रखें और ना हीं उसकी बातों पर अंधविश्वास करें।

* नई बहू के सामने हमेशा अपने गहनों एवं प्रॉपर्टी की नुमाइश ना करें। और ना ही उससे बार-बार यह कहे कि--" मेरे मरने के बाद सब कुछ तुम्हारा ही है।"  इससे बहू के मन में लालच पैदा हो सकता है ।अच्छा होगा कि आप पहले बहू का इस घर में घुल मिल जाने दे तथा उसके मन में ससुराल के प्रति लगाव पैदा होने दें।

* उनकी गलतियों पर ना तो उसका मजाक उड़ाएँ और ना ही उसके मायके वालों को कोसे। बल्कि अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हुए सही-गलत, उचित-अनुचित का ज्ञान दें। परंतु याद रहे कि "हमारे जमाने में ...." वाला जुमला ना इस्तेमाल करें।

* बहू की गलतियों के लिए बेटे को ताना ना दें वरना बहू तो आपसे चिढ़ेगी ही, बेटा भी आपसे दूर हो जाएगा।

* अपने स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दें तथा घरेलू कार्यों में आत्मनिर्भर रहने का प्रयास करें।

* समसामयिक जानकारियों,कानूनी नियमों,बैंक एवं जीवनबीमा संबंधी नियम तथा इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के बारे में भी अपडेट रहें। इसके लिए आप अपनी बहू का भी सहयोग ले सकती हैं। इससे वह आपको पुरातनपंथी नहीं समझेगी, और वह भी किसी बात में आप से सलाह लेने में नहीं हिचकेगी।

* अपने पड़ोसी एवं रिश्तेदारों से अच्छे संबंध रखने का प्रयास करें।

* बेटे बहू को स्पेस दे। उनके आपसी झगड़ों में बिन मांगे अपनी सलाह ना दें।

* परंपराओं के नाम पर  जबरदस्ती के रीति-रिवाज अपनी बहू पर ना थोपें। उसके विचारों का भी सम्मान करें।

* अंतत: ,यदि आपको अपनी बहू का व्यवहार अप्रत्याशित रुप से खतरनाक महसूस हो रहा है तो, आप अदालत का दरवाजा खटखटाने में संकोच न करें ।याद रखिए घरेलू हिंसा का जो कानून आपकी बहू के लिए है वह आपके लिए भी है।

                                                              -----: समाप्त :-----
                                                                                                       आरती प्रियदर्शिनी , गोरखपु

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